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Sunday, 2 October 2016

बापू हम से बात करो


आज 2 अक्टूबर गाँधी जयंती देश के राष्ट्र पिता का जन्म दिवस उनको 147वीं श्रधांजलि देते हुए , एक आवाज आयी की बापू फिर से लोट आओ . वेसे तो बापू की बोहत सारी बाते है जो उनके आस पास होने का अहसास दिलाती रहती है . उन की हर एक बात में ज्ञान है, गाँधी जी एक बात जो सब से ज्यादा प्रभावित करती है वो है त्याग ,त्याग चाहे गुस्से का, अहम् का या भोतिक सुखो को . उसी से मन की स्वच्छता होती है .राष्ट्र पिता पूरण सच को समर्पित थे . उन के सिधान्तों एवम सकारात्मक सोच के कारण ही देश में ही नहीं विदेश में भी उन की महानताओं का डंका है . एक साधारण सा दिखने वाला इन्सान लेकिन उन की बातो में इतनी ताकत की गुलामी से मिली राहत .


आज भारत का जो कुछ भी है उन की ही बदोलत है . मगर जिस आज़ादी के लिए इतने प्रयतन किये संघर्ष किया , आन्दोलन किये , दांडी यात्रा की जेल गये . क्या हम उन कुराबियों को याद भी करते है . वो सब तो बस इतिहास में ही कही दफ़न होता जा रहा है . करप्शन उसका जीता जागता देखता बोलता स्वरूप है . भ्रष्चार केवल पैसे का ही नहीं होता , हमारे विचारों का ,संस्कृति का, हमारे असूल सब कुछ ही तो भ्रष्ट होते जा रहे है . आज के इस दोर में घी सीधी उंगली से निकालता भी कहा है . यदि कोई गांधीवाद को अपनाते हुए कुछ कदम बढाता भी तो लोगो में मजाक बन के रह जाता है . फिर भी बापू का प्रभाव कम नहीं है , वर्तमान को देखे तो आज का दिन स्वच्छ भारत के नाम से मनाया जाने लगा है . गाँधी की का सपना था साफ सुथरे देश का . उनके विचार में सफाई सिर्फ गन्दगी की ही नहीं हमारे विचारों और असूलों से है.  अभी के जो हालत है , हिंसा चारो और अपना दायरा बढ़ा रही है . ये सब गतिविधियों को देखते हुए यही कहने को दिल करता है . अपने आहिंसा का पिटारा खोलो और देश को सही रास्ता दिखलाओ . देश जो अनाथ सा हो गया है . हिंसा और फरेब में कही खो गया है . उसे फिर से हिंसा से आज़ाद करो, बापू हम से बात करो .  

by:RG

Monday, 19 September 2016

तबदीली

हमारे सभ्य समाज में महिलाओं को ले कर सोच का दायरा बड़ा ही विचित्र और तिरछा है . एक तरफ तो अधिकार भी दिए तो और कर्तव्यों की लम्बी कतार भी. रोक टोक का दायरा इतना बड़ा है की, आजादी केवल बेड़ियों तक सिमित है एक एक गांठ खोलने में ही इतना वक़्त गुज़र जाता है की बुलाने पर लोट के नहीं आता है. पैरों में पायल, हाथों में कंगन जेसे गहनों की रस्सियाँ पहना दी गयी है. रीत रिवाज का टिक्का माथे पे चमका दिया. उस के उपर बंदिशों की जकड़न, और फिर शुरू होता है तबदीली का लम्बा इंतजार....

कुछ इलाकों में अभी भी औरत का वजूद आज भी वेसे ही है, जेसे सदियों से चला आया है. प्रकृति के अनुसार कमजोर, ढीला, पिछड़. .सुबह से शाम तक ऑफिस घर और रसोई की भाग दौड़ में अपना वजूद खो के बहती रहती है उमर भर. आजादी की पहेली को सुलझाती एक अधूरी तस्वीर को उभारती. सभ्यता और समाज की पतली दीवार को फांदने की कोशिश करती. इलज़ाम और बेगुनाही को खंगालती, अपमान और सम्मान को समेटती. फ़र्ज़ और परिस्थितियों की उंगली थामें, समय के साथ अटूट इरादों से चलती. कामयाबी की और बढाती कदम किस्मत को कोसती. क़ाबलियत और चुनोतियो से लड़ती, आत्मविश्वास से चलती . तरसती उस मुकाम को जो उस का हक़ है उसे पाने को. जो सिर्फ नींद में ही पूरा हो सकता है. जरा सोचो अगर ऐसा हो सकता नींद के खवाब को शकल दे पाती ? मुमकिन है बस पुरुष प्रधान देश में पुरुष अपनी सोच में तबदीली ले आये, और कदम के साथ कदम मिलाये. अपनी मानसिकता को स्वच्छ बनाये . 

by:RG

Monday, 5 September 2016

टीचर्स डे

हमारे ग्रंथों में भी लिखा है गुरु गोबिंद दोनों खड़े का के लागू पाँव बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो बताये. ...
शिक्षक हमारी बुनियाद का आधार होते है .सफलता की सब से पहली सीडी होते हैं . माता पिता के बाद एक टीचर ही ऐसा है जो चाहता है की हम कुछ बन जाये, कामयाब हो जाये .रास्ते से भटकने वाले बोहत होते है. मगर ऐसे कम ही लोग है जो भटकन को मंजिल दिखाते है.  ऐसे ही हमारे राजीव कोहली "सोच थिएटर ग्रुप" के डायरेक्टर. जो हर डगर पर हमारा मार्गदर्शन करते है, और अपने स्टूडेंट्स को बेहतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते .व्यक्तिगत ही नहीं निजी तौर पर भी एक साधारण से इन्सान है . उनकी सब से बड़ी खूबी सकारात्मक रवैया ओर उर्जा .जो एक सुलझे हुए इन्सान की पहचान है . गुरु के पास इतना ज्ञान का भंडार होता है उनसे जितना भी सिखाने को मिले हमेशा कम ही लगता है . ये लालच है या भूख हर बार एक भिक्षुक के जेसे त्रिशना बढती ही जाती है . हर बार कुछ नया ही सिखाने को जो मिलता है .
कहने को तो बड़ा कुछ है , लेकिन मेरे शब्दों में वो बात कहा , बस इतना ही के ....

एक ज़िन्दगी निकल जाती है पहचान बनाने को, जिस मुकाम को आप ने पाया है सजदे में आप के सब ने प्यार बरसाया है.


 by:RG

Monday, 29 August 2016

सकारात्मक सोच

आज सुबह से ही बादल बरस रहे थे, तो सोचा थोडा वक़्त बहार बिताया जाये. बरसात के बाद जब ठंडी हवा चलती है तो बड़ा ही मीठा सा अहसास होता है . सुहाना मोसम कभी एक सा नहीं रहता .धीमी हवा शीतल महकदार, ज़रा सा बहाव तेज़ की आंधी का रूप ...

हमारी निजी ज़िन्दगी भी कुछ कुछ ऐसी ही है मेल खाती है, ज़रा सा किसी दूसरी और तवाजो दिया इधर रेत की जेसे फिसली हाथ से, बावरी लहर से चली जाती है . हवा में उड़ना चाहते हो तो, सही वक़्त सही निर्णय हो . अपने अंदर एक सुलगन रहने दो इधर हवा चली उधर धूँआ उठा यहाँ चिंगारी ने आग पकड़ी . फिर इस तूफान को कोई नहीं थाम सकता .गिर के उठाना वही जानते है जो हार क्या है नहीं जानते है .लेकिन किसी को पाना और किसी को हासिल करना दो अलग पहलू है . एक सत्य है तो दूसरा यथार्थ .तस्वीर एक ही है बस वर्णन में नज़र का फेर है . समझदारी समय के साथ समझोता करने में ही है. प्रयत्न ही एक मात्र डगर है .अपनी मंशा की बीसाक कुछ इस तरह से बिछाना की परिस्थियों को शय से मात दे जाना .ना नफरत से ना क्रोध से ना ताकत से ना विरोध से बल से और ना ही छल से जीत तो हासिल होती है केवल सकारात्मक सोच से .


 by: RG

Monday, 22 August 2016

सपने

गहरी नींद में थी सपने में कही भागी दौड़ी जा रही थी.. अलारम बजा, थराह के जागी. ऐसा क्या पीछे छूट गया जो दिन की रौशनी में नहीं दिखा ....
बंद पलकों के नीचे अँधेरा , उस काले गहरे अँधेरे में खवाबों की रोशनी, जो उस उजाले की और इशारा करती है. जहा सिर्फ ख़ुशी और संतुष्टि मिलती है. चाहतों को पूरा करने के लिए यकीन और उम्मीद ऐसे दोपहिया वाहन है, जिस के बिना गाडी चलना तो दूर हिल भी नहीं सकती.  गर मुझे खुद पर यकीन है और उम्मीद का दामन है. तो कोई भी ताकत मेरे खवाब्बों में दरार नहीं डाल सकती. है मगर यकीन तभी आ सकता है जब मुझे तजुरबा है . वो क्या है की इल्म से आज़ादी की दायरा बड़ा हो जाता है. जीतनी बंदिशे कम हो गी मंजिल का रास्ता छोटा होता चला जाये गा . दिशा, दिशा की पहचान पाना सब से बड़ा सवाल ? आसन है जिस तरह बाहर जाने से पहले हम इन्क्वायरी करते है दूसरों से पूछ ताछ करते है हर तरह से नेगेटिव पोसिटिव का आंकलन तैयार करते है . ठीक वेसे ही समझदारी से कदम रखिये. कामयाबी हर वक़्त साथ हो गी .अक्सर ज़रूरी नहीं कामयाबी की और बढता कदम सच्चा हो अच्छा हो, क्यूकी सच्चाई ,अच्छाई और कामयाबी कभी दोस्त बन ही नहीं सकते . तो साम दाम दंड भेद से आगे की और रुख करे , रास्ता अपने आप बनता चला जाये गा. बस हिम्मत नहीं छोड़ना. सपने देखना कभी कम न करना….

By: RG       

Sunday, 14 August 2016

बस एक ही जीवन काफी है क्या?: आज़ाद भारत

बस एक ही जीवन काफी है क्या?: आज़ाद भारत: आज़ादी की सुबह बालकनी में खुले आसमान में देख रही थी , रंग बिरंगी गोते खाती हुई पतंगे , हवा में घुलता गुलाल , लहराता हुआ ...

आज़ाद भारत

आज़ादी की सुबह बालकनी में खुले आसमान में देख रही थी, रंग बिरंगी गोते खाती हुई पतंगे, हवा में घुलता गुलाल, लहराता हुआ हमारा तिरंगा चारो और ख़ुशी का मस्ती का माहोल...   
आज 15 अगस्त भारत की आज़ादी का दिन , 1857 के 159 बरस या आज़ादी के 69 साल . 1857 का गदर कहे या आज़ादी की पहली लड़ाई ? आजादी के जश्न में 69 साल पलक झपकते ही निकल गये . देश कहा को था और कहा को चला ? कल भी देश सोने की चिड़िया था आज भी कहलाता है . पहले भी हिन्दुस्तानी विदेशी वस्तुओं से परभावित थे आज भी है . बदलाव हुआ भी है के नहीं, हुआ है ना टेक्नोलॉजी बदली, हमारा सविधान बदला मगर हमारी जड़े अभी भी वही है यानि के हमारी परंपरा, संस्कृति, रीत-रिवाज़ . कही कही विचारधारा भी ....
अभी भी हिन्दू मुस्लिम का मुद्दा ज्यों का त्यों है . दलित और गरीब के साथ अभद्र व्यव्हार, महिलाओं के साथ बुदसलूकी आम सी बात है... बेरोज़गारी सब से बड़ी समस्या है . हमारे देश के 50% से ज्यादा आबादी यंग है . किसी भी देश के लिए ये गर्व की बात है . लेकिन हमारा यूथ ही सब से ज्यादा परेशान है .कभी अच्छे इंस्टिट्यूट में ऐडमशन के लिए तो कभी नौकरी के लिए.  
विकास तो हो रहा है बस दिशा की पहचान नहीं लक्ष क्या होना चाहिए फिर से पीछे की और या आगे बढना  है  ? एक सभ्य समाज के लिए हमारी मानसिकता का विकसित होना सब से ज्यादा जरुरी है . हर एक क्षेत्र में सब को अपनी अपनी काबिलियत के अनुसार काम मिले . छोटे, बड़े, अमीर, गरीब का अलाप बंद हो जाये तो हमारे देश की ताकत कई गुना हो जाये गी.
जिस तरह हम मुसीबत या प्रकृतिक आपदा आने पर सब एक हो जाते है . क्या हम हमेशा साथ नहीं हो सकते ? रोज़ अख़बार की सुर्ख़ियों को पढ़ के अफ़सोस जताते है . भ्रष्ट भी हमी है और भ्रष्टचारी भी . हम क्यू भूल जाते है बापू की कही हुई बातों को ? गीता में लिखित शालोकों को . क्यू याद नहीं आती हमे भगत सिंह और राजगुरु की कुर्बानियां. क्यू अनदेखी कर देते है खून से लिखी कहानियां .          
आंखे मूँद लेने से केवल अँधेरा होता है , सपनो का जनम भी बंद आँखों में ही होता है . एक सपना सच्चे और अच्छे विक्सित भारत का, सपना उन्नति का, बराबरी का ,सपना सरहद पे बैठे नोजवानों की सुरक्षा का, सपना भारत माँ की गरीमा का ....
                                जिंदाबाद !


 By:RG         

असान दिशा-ज्ञान