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Wednesday, 22 June 2016

Soch Theatre Group presents Sach- A mirror to the society. Sardar ji - By Khawaja Ahmed Abbas Adapted & Directed by - Rajiv Kohli Music Score - Nirved Prateek Actors - Sahil Ahuja, Siddharth Vijay, Praveen, Deepak Mohite, Sachin, Anuj, Manav, Manav Mehta 3rd July 2016, 6:00 pm, Muktdhara Auditorium, Gol Market, New Delhi https://www.youtube.com/watch?v=oB3JGgbQKpE Event Link - https://www.facebook.com/events/1719490728309039/ Block your seats on - http://www.sochtheatre.com/block-seats


बचपन

शाम का वक़्त था, मै पार्क में टहलने गयी ! वहा कुछ बच्चें खेल रहे थे उन को देख के यादो की खिड़कियाँ खुलने लगी , छोटी थी तो हमेशा बड़े होने की जल्दी थी ! आज़ादी मिले गी दोस्तों का साथ हो गा जैसे एक परिन्दे को खुला आसमान ! मगर जब से बड़े हुए हैं फिर से बचपन में जाने की चाह है क्योंकि जो मस्ती बेफिक्री और आराम है वो अब नहीं ! खुली आँख का सपना मेरा किसी की आवाज़ से खुल गया किसी की आवाज़ कानो को छू रही थी ! देखा तो एक लड़का था हो गा कोई 10-12 बरस का बोहत से मिटटी के खिलौने ले रखे थे! उस ने बोला एक खिलौना ले लो मैडम बोहत सस्ता है, बेबसी और लाचारी उस के चेहरे से साफ छलक रही थी ! वो फिर बोला ले ली जिए ना ! उसे देख कर गुस्सा भी आ रहा था और दया भी ! गुस्सा इस लिए की (12 जून) हम इंटरनेशनल चाइल्ड लेबर डे सेलिब्रेट कर रहे है (1986 मे कानून लागू हुआ जिस के तेहत 14 बरस के कम बच्चो से काम लेना कानूनी अपराध है) और एक ये चाइल्ड है जिसे इस का मतलब भी नहीं पता, वो तो बस २ पैसे कमाने की कोशिश में है. एक तरफ वो फूल थे जिन को महकता देख मैं भी खुशबू सी हो गयी ! और एक ये मेरे सामने ...
मैं वही खड़ी थी, और वो किसी और के पास चला गया खिलौना बेचने के लिए ! मैं पार्क से वापिस लौट रही थी तो रास्ते में चाय की टपरी पर कुछ युवक गप शप कर रहे थे उन में से एक ने आवाज़ दी ओये छोटू चाय दे जा, तो वही एक और कोई सड़क पर कचरा चुन रहा था ! तो कही कंस्ट्रक्शन साईट पर  ब्रिक्स उठाते हुए एक और दिखा . एक सवाल की दस्तक हुई  “बुक्स और ब्रिक्स” ? भारत एक विक्सित देश है ,क्या ये हमारा आने वाला कल है ये विकास नहीं हो सकता ? लेकिन ये क्या हो रहा है नज़र घुमा के देखा तो जो दिखाई दे रहा था वो मैं देखना नहीं चाहती और शायद आप को भी अच्छा ना लगे ,बाल श्रम हमारे चारो और हो रहा है ! जेनरलस्टोर से ले कर फैक्ट्री,घर से ले के ऑफिस बॉय तक,कैंटीन से होटल  हर छोटे छोटे कम के लिए हमें हेल्पिंग हैण्ड की आदत हो गयी है !         
 हमारे सामने एक लाइव एक्सामपल है हमारे प्रधानमंत्री Mr N Modi Ji जो खुद बालमजदूरी के शिकार रहे है !
हम सब देख कर भी नज़र अंदाज़ कर देते है ! रोज डिबेट्स करते है पोलिटिकल,फैशन, भ्रष्टाचार पर ! मगर ये भूल जाते है हम भी इन सब का ही हिस्सा है !
क्या इन नन्हे फरिश्तों को कोई हक़ नहीं है खेलने का शिक्षित होने का ?
हा बिल्कुल हक़ है , आज बहुत सारी NGO है जो नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर काम करते है

“बचपन बचाओ आन्दोलन “कैलाश सित्यार्थी जी जो पिछले 60सालो से चाइल्ड लेबर के विरोधी है वो पहले भारतीय है जिन्हे नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया ! उन्होंने अब तक हजारों बच्चो को उन का बचपन लोटाया है !
हम सब को भी कैलाश जी की तरह ऐसा कुछ करना चाहिए . अगर हम सब मिल के एक छोटे से पोधे को सींचे गे तो बड़ा हो कर वो हमे ठंडी छाया और फल दोनों दे गा !





























Monday, 13 July 2015

Soch Theatre Group kalptaru.blogspot.in

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Sunday, 5 July 2015

ओफ्फिस के अनोखे फंडे

ऑफिस जाना कौन पसंद नहीं करता । शायद कोई नहीं ☺पर क्यों कभी सोचा है आपने। चलिए आज इसी बात का परिकक्षण निरीक्षण करते हैं। करेंगे मेरे साथ। चाहूँगा की इस ब्लॉग पे आप अपने कमेंट्स जरूर पोस्ट करें।आखिर आप लोग भी काफी हद तक सहमत होंगे मुझसे। ऑफिस न जाना चाहने के कई कारण हो सकते हैं कुव्ह तो सच पर ज्यादातर बहाने । तो इस ब्लॉग में बहानो पर ध्यान केंद्रित करेंगे। कुछ आम बहाने यहाँ पर लिखते हैं पहले
1 अब क्योंकि हम सब में से ज्यादातर लोग ऐसा काम कर रहे होतें हैं जो वो करना नहीं चाहते थे लेकिन परिस्थितयां कुछ ऐसी थी की करना पड़ा । इसलिए काफी लोगों का तो मन ही नहीं करता और वो अक्सर ज्यादातर टाइम अपने बॉस या काम को कोसने में बिताते हैं । ओसे लोग हर प्रयास करते हैं हर दूसरे दिन ऑफिस न जाने के। कभी तबियत ख़राब खुद की ।कभी बीवी या बच्चे की तबियत ख़राब या फिर कभी किसी रोश्तेदार की बीमारी
2 अब कुछ ऐसे लोगों से मिलिए जिनका बचपन से लेकर आज तक कभी काम में मन लगा ही न हो। जी हाँ हैरान मत हों ऐसे भी लोग होते हैं। भाई इनके हिसाब से तो हर रविवार के बाद शुक्रवार आ जाना चाहिए।
लोग चाहें जैसे भी हों मकसद वही की किस तरह ऑफिस की टेंशन से निजात पाया जाये ।

Sunday, 28 June 2015

राहगिरी एक सकारात्मक मनोरंजक पहल

ह  आजकल हम लोग इतने आलसी हो गए हैं की व्यायाम खेल कूद कसरत वर्जिश जैसे शब्द् हमारी शब्दावली से मिट गए हैं। और कुछ ऐसा ही मेरी जिंदगी में भी है। ऑफिस की थकान के बाद रात को देर से सोना सुबह देर से उठना और फिर शनिवार तो जैसे लाटरी लग जाती है । शायद ही कोई ऐसा रविवार होगा जब मेब चढ़ता सूरज देखा होगा। लेकिन इस दुनिया के साथ एक और दुनिया भिभाई जहाँ लोग सोमवार से शनिवार तक ही नहीं बल्कि रविवार को भींजल्दी उठते हैं। अब आप पूछेंगे की भाई राजीव ऐसा क्यों । वो इसलिए दोस्तों क्योंकि एक बहुत बड़ा झुण्ड ऐसे लोगों का आपको कनाट प्लेस रोहिणी द्वारका नॉएडा गुडगाँव में मिलेगा। अब आप कहेंगे राजीव भाई पहेली न भुजाओ सीधे बताओ ऐसा क्यों। राहगीरी जी हाँ राहगीरी के बारे में सुना होगा आपने एक ऐसी शुरुआत जिसने लोगों को अपनी और आकर्षित किया उन्हें प्रेरित किया की वो व्यायाम कसरत और अपने स्वास्थ्य के प्रति भी जागरूक रहे। लेकिन दोस्तों राहगीरी केवल इस सब का नाम नहीं यहाँ पे और भी कई इवेंट्स होती हैं जैसे डांस म्यूजिक और उससे भी ऊपर नुक्कड़ नाटक। सुबह सुबह तारो ताज़गी का दूसरा नाम है राहगीरी। और सबसे बड़ी बात ये की यहाँ कोई भी जेक अपनी कला का प्रदर्शन कर सकता है। सही माईने में सबके लिये एक सही और सकारात्मक शुरुआत ।

Friday, 26 June 2015

सुबह की चाय

सच ही है की सुबह की चाय और अखबार एक साथ जब हों हाथ में तो दिमाग से साडी भसड निकल जाती है। अरे भाई आम आदमी के शब्दों में कहें तो गरमा गरम चाय के साथ गरमागरम खबरें पड़ने का आनंद ही कुछ और है । और खबरें भी बिलकुल चाय के टेस्ट की तरह कभी कड़क तो कभी फुस कभी ज्यादा मीठी तो कभी फीकी । पर क्या कीजिये जब इस शारीर के डाइजेस्टिव सिस्टम को दोनों अखबार और चाय की आदत सी पड़ गयी हो तो इनके बिना पिछले दिन का खाना हज़म नहीं होता। चलिए अब आज का काम भी शुरू करना है । ख़बरों में क्या था ये आगे के ब्लॉग में बताऊंगा। सुप्रभात ।

Wednesday, 24 June 2015

दिल धडकने दो यादें ताज़ा हो आई - राजीव कोहली

आज काफी दिनों बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ... यही सोचा है और निश्चय किया है की ब्लॉग लिखने को भी अब हर रोज़ का नियम बना लूँगा. लिखने से आपके मन को एक विशेष अनुभूति होती है. कुछ ऐसा लगता है की जो भी बोझ आपके मन में था या कुछ ख़ुशी के पल जो आप अपने मन में संजोये बैठे अकेले जी रहे थे वो पल आपको सभी के साथ बाट्ने का मौका मिल जाता है. खैर ये ब्लॉग मैं समर्पित करता हूँ बीते हुए दो दिनों को जिन दो दिनों में मैंने कई ख़ुशी के लम्हे जिए. इन दो दिनों ने मेरी ज़िन्दगी के कई बिखरे हुए पन्नो को एक किताब में फिर से संजो दिया. परसों ही अचानक जब facebook पे अपने अकाउंट को टटोल रहा था तो एक फ्रेंड रिक्वेस्ट आई देखा तो और किसी की नहीं मेरी कजिन सिस्टर ने रिक्वेस्ट भेजी थी. देखते ही ख़ुशी का ठिकाना न रहा. ऐसा लगा की इतने दिनों बाद facebook ने कुछ तो अच्छा किया मेरी सिंदगी में. यही नहीं सिस्टर से चाट करने का भी मौका मिला उसने कहा की facebook जैसे समुन्द्र में आखिर उसने अपने भाई को ढून्ढ ही लिया. अब आप सोचेंगे की इसमें कौन सी बड़ी बात हुयी भाई facebook पे तो आये दिन अपनों की या कभी परायों की फ्रेंड रिक्वेस्ट आती ही रहती है. लेकिन नहीं जनाब आप मेरी बात से सहमत होंगे की ये बड़ी बात थी जब आप ये जानेंगे की सिंदगी के रोज़ मर्रा  की मसरूफियत ने हम सभी को इतना दूर कर दिया है एक दुसरे से की मेरी सिस्टर जिसका मैं जिक्र कर रहा हूँ मेरे घर से फरलोंग की दूरी पर ही रहती है फिर भी शायद कई महीने बीत गए होंगे उसको और मुझे मिले हुए यही नहीं स्मार्ट फ़ोन भी काम नहीं आये और एक कॉल तक नहीं की जा सकी. इसलिए कल जब उसके साथ facebook पे मुलाकात हुयी तो चाहे ये मुलाकात २१वी सदी के तरीके से मिलना ही सही लेकिन दिल को बहुत तस्सली मिली और बेहद ख़ुशी हुयी. facebook ने एक और ख़ुशी दी मुझे कल मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन के एक दोस्त ने मुझे पिंग किया और हमारे कॉलेज का एक नया whats app ग्रुप बना जिसमे मुझे सम्मलित किया गया. और वहाँ पे सभी पुराने दोस्तों से बात करने का ये जानने का की वो लोग कहाँ हैं मौका मिला. और इन्ही सब लोगों में से एक है मेरी सबसे प्रिय और सबसे करीबी दोस्त जिसको मैं कई सालों से ढून्ढ रहा था लेकिन कुछ अत्ता पता नहीं चल रहा था. आज अभी ये ब्लॉग लिखने से पहले उसके साथ चाट हुयी और जाना की वो भी दिल्ली के बेहद करीब ही रहती है लेकिन बस हम जानते ही नहीं the हम लोग कहा गुम हैं अपनी ज़िन्दगी में. बस इतना ही कहूँगा की thank you facebook. आज मैं बहुत खुश हूँ.

Tuesday, 23 June 2015

क्रिसमस का तोहफा - लेखिका - ऋचा चतुर्वेदी




मिस्टर मेहरा का  परिवार  एक  मध्यम  वर्गीय था. दो  प्यारे   नठखट  बच्चे और पति और पत्नी . मिस्टर
मेहरा एक प्राइवेट कंपनी में इंजीनियर थे और उनकी पत्नी हाउसवाइफ दोनों बच्चे स्कूल जाते थे. जब बच्चे बड़े होने लगे तो मिसेस महरा के पास कुछ खली समय बचने लगा. उन्होंने एक स्कूल में नौकरी कर ली आखिर वो भी एक क्वालिफाइड औरत थी और धीरे धीरे उनसे कई बच्चे घर पे भी पड़ने आने लगे . वैसे तो उन्होंने समय बिताने के लिए ये काम शुरू किया था ;यकीन अब वो इतनी मसरूफ रहने लगी की समय की कमी होने लगी.
घर में छोटे छोटे काम के लिए समय काम पड़ने लगा इसलिए उन्होंने अपनी  कामवाली को कहा की  वो शाम को थोड़ा ज्यादा देर तक रुक जाया करे, पर क्यूंकि कामवाली के पास पहले से ही इतने घर थे की उसने भी आगे अपनी बेटी को मिसेस मेहरा के छोटे मोटे काम करवा देने के लिए शाम को रुकने के लिए बोला .. धीरे धीरे सारा का सारा काम ही बच्ची के ऊपर आने लगा.
दोनों बच्चो को अपनी हम उम्र बच्ची के काम करना अच्छा नहीं लगता था. खासकर तब जब वह बच्ची बड़ी उम्मीद भरी नज़रों से उनका स्कूल का बैग और किताबें देखती थी
जब क्रिसमस की छुट्टियां आई और दोनों पति पत्नी ने बच्चों से कोई गिफ्ट मांगने को कहा  तो बच्चो ने उस कामवाली की बेटी का स्कूल में दाखिला करवाने की लिए कहा...यह सुन कर दोनों पति और पत्नी हैरान रह गए और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. अब शाम को और बच्चो के साथ मिसेस मेहरा उस बच्ची को भी पढ़ाने लगी. उस सोसाइटी के कुछ परिवारों ने मिलकर उस बच्ची के स्कूल का खर्च उठाने का जिम्मा भी ले लिया. अगर हम सब नागरिक लड़की को पढ़ाने के प्रति जागरूक हो जाएं तो इस देश को अवश्य प्रगति की और ले जा सकते हैं




Saturday, 2 May 2015

APRIL RAINS- By Mudit Agrawal


April Rains.
relief from the rising heat
a phone call, to a lover
to meet beneath the dark clouds
and hold hands and to kiss,
and gather
memories, sweet in the
April Rains.
a beautiful wife too
holds hands
of her corpse husband,
a farmer
who died last night
of shock, a natural death,
at the view
of his devastated yield
and left behind
memories
of hard labour, lost
and a legacy
of debts.
April Rains.

Almighty - My Lord By Neha Shamshery

It’s all so uncertain
It’s all so unplanned
That to fret on it is
Waste of time

What you get
And what you want
Is not a matter of luck
instead god defined..

One day you giggle
the next moment you cry
one second you dream
in a flash it dies..

You strive, you struggle
You sweat, you toil
You resist, you fight
Just ask, why?

Question yourself
And then no one
Just set off
And let him decide

असान दिशा-ज्ञान