Pages

Wednesday, 14 January 2015

सितारा हूँ मैं - लेखक - सुमित झा

मेरी यह स्वरचित कविता एक ऐसे झुग्गी झोपडी में रहने वाले बालक के इर्द-गिर्द घूमती है जिसे इस सभ्य और शिक्षित समाज ने गन्दा और मनहूस कह कर दुत्कारा है 

लेकिन यह बालक कुछ अजीब सा है 
गरीब होने का अफ़सोस बिलकुल नही है 
इसके हौसले अभी बुलंद हैं 
कहता है एक दिन सितारों सा चमकेगा 
कहीं दूर गगन में

 



आईये इसकी बातों को सुने-
ग़र्दिश में ही सही नीले आसमां का सितारा हूँ मैं
दूर ही सही झील सी आँखों का तारा हूँ मैं
इस घोर अन्धकार में ही सही कल एक चमकता उजियारा हूँ मैं सितारा हूँ मैं
मज़धार में ही सही अनंत सागर का किनारा हूँ मैं
यह रूखे होठ ही सही इक मुस्कान प्यारा हूँ मैं सितारा हूँ मैं
हैं लड़खड़ाये आज कदम तो क्या यह डगमगाती चाल ही सही अनगिनत अधेरो का सहारा हूँ मैं सितारा हूँ मैं
हैं पैरों में आज बंदिश तो क्या संसार अमीरों की रंजिश तो क्या बंद पड़े मंदिर मस्जिद के पट तो क्या यह सीमित गलियारा ही सही वह बादल मनचला आवारा हूँ मैं सितारा हूँ मैं
हैं पग में पड़े छाले तो क्या उदर में धधकते ज्वाले तो क्या जगा मैं रातें सहश्र तो क्या यह अत्यंत साधना ही सही कल एक अमिट फ़साना हूँ मैं तराना हूँ मैं
सितारा हूँ मैं

Tuesday, 13 January 2015

दिल्ली का ट्रैफिक उफ़ तौबा

यह ब्लॉग से वो सब लोग खुद और भी जोड़ के देख पाएंगे जो हर रोज़ दिल्ली के ट्रैफिक से झूझते हैं। जी हाँ दिल्ली में ट्रैफिक से झूझना ही पड़ता है। खास तौर पे जब ऑफिस आपके घर से 40 या 50 किलोमीटर की दूरी पे हो। दिल्ली में अगर आप नए आये हैं और जिसी कट्टर दिल्ली वाले से पूछेंगे की भाई साहेब जरा ये तो बताएं की धौला कुआँ से करोल बाघ कितनी   दूर है। तो चौंकिएगा नहीं की अगर आपको जवाब मिले जी बस 20 मिनट में पहुँच जायेंगे। जबकि आप सोच रहे होंगे की किलोमेतव्र में कितना दूर है यह बताओ भाई। दिल्ली में तो यही दूरी वक़्त के हिसाब से घाट जाती है या बाद जाती है। जैसे अगर सुबह 8 बजे से 10 बजे तक अगर धौला कुआँ से करोल बाघ जाना हो तो 20 मिनट नहीं कम स ेकम 45 मिनट तक  लग सकते हैं यही अगर आप 11 बजे से 5 बजे के बव्वच जायेंगे तो 20 मिनट औए फिर अगर 5 बजे से 8 बजे तक फिर से 45 से 60 मिनट तक भी लग सकते हैं। ऐसा है दिल्ली के त्रफडीसी का कहर। सबसे बड़ी समस्या है लोगों का सड़क सुरक्षा नियमो के प्रति सवेंदनशील न होना। लोग जानते तो हैं की हेलमेट न पहनने से दुर्घटना होने पे जान भी जा सकती है लेको फिर भी फैशन के चलते हेलमेट नहीं डालते। गाडी चलाते मोबाइल पे बात करते हैं । लेन में गाडी नहीं चलाते। दिल्ली में हर 5 मं में एक न एक दुर्घटना होती है। न जाने दिल्ली का ट्रैफिक कब सुधरेगा। रुकिए शायद इसका जवाब हमारे ही पास है। ये तभी सुधेरेगा जब हम सब सुधरेंगे। तो आइये वादा करें की सावधानी से चलेंगे और सड़क सुरक्षा के सभी नियमो का पालन करेंगे। नहीं तो बस यही निकलेगा मुंह से दिल्ली का ट्रैफिक उफ़ तौबा। 

युवा शक्ति- लेखिका ऋचा चतुर्वेदी

Go forward without a path,
Fearing nothing, caring for nothing!
Wandering alone, like the rhinoceros!
Even as a lion, not trembling at noises,
Even as the wind, not caught in the net,
Even as the lotus leaf, untainted by water,
Do thou wander alone, like the rhinoceros!
ये  गौतम बुद्ध की  कहे शब्द है  जिनसे  स्वामी विवेकानन्द ने  प्रेरणा ली थी |१२ जनवरी स्वामी विवेकानन्द की जन्मतिथि है| इस महान दिन को भारत में युवा दिवस के रूप मे मनाते है| युवा पीढी हमेशा ही देश का दुनिया का भविष्य समझी जाती है , पर आज की युवा पीढी के लिए शायद चमक इतनी ज़्यादा है कि रास्ता और मन्ज़िल दोनो ही धुन्धला गये है| आशाओं को कस के थामने की जरुरत है फिर से विवेकानन्द .जैसे लोगो के संदेशो को समझने की जरुरत है| ,खुद पर विश्वास और कुछ बेहतर करने का हॉसला ही एक युवा की ताकत है, निराशा शब्द युवा शब्दकोष से दूर ही रहना चाहिये|
सपनो का सफर जब सच के धरातल से टकराता है तब मन निराशा से घिर जाता है | उम्मीदे ना पूरी होने से कुछ लोग ड्रग्स के धुए मे अनमोल पलो को उड़ा देते है तो कुछ इतने गलत रास्ते पर चल देते है कि वापसी की कोई राह नही बचती | एक बार सोचे जरूर ............
ये किताबो मे गुलाब रखने की उम्र है ,दिल मे उम्मीदे बेहिसाब रखने की उम्र है |
इस उम में भिगाना ना अपनी पलके ये तो इन आँखों मे ख्वाब रखने की उम्र है ||

Monday, 12 January 2015

लोहरी का त्यौहार- लेखक राजीव कोहली

बचपन से ही लोहरी का त्यौहार हर्ष और उल्लास का त्यौहार रहा है। अब भाई पंजाबी फॅमिली से हैं तो क्यों नहीं होगा भी। मूंगफली गजक रेवाड़ी और फुलले यानि की पॉपकॉर्न खूब मज़े में खाओ और वो भी अनलिमिटेड। कई बार तो यह त्यौहार अपनी नानी के घर मनाया। पुराने ज़माने में तो गली के बच्चे घर घर जेक लोहरी भी मांगते थे पर अब यहाँ दिल्ली में कभी ऐसा नहीं देखा। आज भी हम घर पे लोहरी मंक्टे हैं शाम को घर की बालकनी में बैठक लग जाती है कुछ पल के लिए सर्दी को भूल के लोहरी का पर्व ही याद रहता है। लोहरी नए साल के आगमन का भी पर्व है। पुरानी यादों को भुला कर नए सिरे से जिबदगी की अहरुआत करने का पर्व है। पंजाब में तो इसकी खूब धूम रहती है। मेरे लिये लोहरी का त्यौहार अपनी साडी बुरी यादों बुरे समय को भूल कर एक नए उमंग के साथ नया साल शुरू करने का त्यौहार है। आप सभी को लोहरी की लख लख बधाई।

Sunday, 11 January 2015

अस्मिता के साथ मेरे सफर की शुरुआत- लेखक राजीव कोहली

यह ब्लॉग समर्पित है मेरे गुरु, मेंटर श्री अरविंद गौर सर के लिये। मुझे आज भी याद है वह शुक्रवार का दिन था एक बहचर्चित फिल्म, "टू स्टेट्स" रिलीस हुई थी। आफिस में सभी फिल्म देखने जाने का कार्यक्रम बना चुके थे। इससे पहले कई हफ्तों से मैं बड़ी शिद्दत से ढूंड रहा था, एक ऐसा थियेटर ग्रूप जहां पे अच्छा थियेटर होता हो। कई दिन तक ढाके खाने के बाद मेरे आफिस में काम कर रहे एक सहकर्मी से पता चला अस्मिता के बारे में। मुझे कहा गया, बल्कि यूं कहूँ तो येह सुझाव दिया गया की नाटक देखने आये और अरविंद सर से मिलें। 

अगर उन्होने बुलाया तो ही आप अस्मिता का अंग बन पायेंगे। इससे पेहले कभी कोई नाटक नहीं देखा था। मन में बहुत विचार विमर्श चल रहा था। जाऊँ या नहीं जाऊँ। लेकिन थियेटर में शामिल होने का ऐसा जूनून था की जाने का फैसला किया। और सच पूछिये, अपने को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ, की मैने जाने का फैसला किया। अपनी लाइफ का शायद सबसे सही फैसला था। नाटक का नाम था "दस कहानियाँ" जिसमे विभिन् लेखकों की बेहतरीन कहिंयों को मंचित किया गया। सच मानिये वो एक घंटे तीस मिनिट का नाटक तीन घंटे की किसी भी फिल्म देखने से बहुत उत्तम अनुभव था। उसमे हासना था, व्यंग था, एमोशन था, रोना था। हर कहानी दिल को चू गयी। और वहीं से शुरू हुआ मेरा सफर अस्मिता के साथ। दिल से शुक्रगुज़ार हूँ, अरविंद सर का, और शिल्पी मॅम का, और ईश्वर का की मुझे ये मौका मिला है की मैं अस्मिता के साथ जुड़ा हूँ।



Saturday, 10 January 2015

"धरा" - सुनील मोरवाल द्वारा लिखित

कर्मभूमि ये धरा है मेरी,
जिसकी गोद मे मेरा बचपन खेला!
आज जब मानव बढ़ रहा है तरक्की की राह पर,
तो कैसे छोड़ दूं मैं उसे अकेला!!


वनों से था जिसका सौन्दर्य,
पशु पक्षियों का जहाँ लगता था मेला!
आज वो पिंजरे मे बंद तरसते हैं अपनी आज़ादी को,
तो कैसे छोड़ दूं मैं उन्हें अकेला!!

हर तरफ पहाड़ों का साया था,
झीलों और झरनों से था जिसका यौवन अलबेला!
अब रेगिस्तान मे सिमट कर रह गयी तन्हाई जिसकी,
तो कैसे छोड़ दूं मैं उसे अकेला!!

हमेशा चाही है खुशी जिसने हमारे लिए,
हम पर आई हर विपदा को है जिसने झेला!
आज वोही माँग रही है हमसें हमारा साथ,
तो कैसे छोड़ दूं मैं उसे अकेला!!

आओ मिलकर रोकें इस प्रकृति विनाश को,
फिर से शाम की सूचक बने गोधुलि बेला!
लौटाएँगे धरती को उसका सौन्दर्य वापस,
नहीं होने देंगे उसे कभी अकेला!!

Friday, 9 January 2015

डाकिया - ऋचा चतुर्वेदी द्वारा लिखित



काली साईकिल बड़ा झोला l
निज़ी सन्देशे सरकारी चोला ll

जी हाँ ! वही डाकिया जो डाँक लाता था l
अपने  कंधे पे  सन्देशे  टाँक  लाता  था ll

लाया हो पहली तन्खाह का मनी-ओडर या नयी नौकरी की बधाई l
फिर डाकिये की खातिर एसी जैसे आया हो नया जमाई ll

उस नीले अन्तेर्देशि ने तो गुढिया का रिश्ता जोड़ा था l
एक छुटके से कागज ने गली के चार लड़कों का दिल तोड़ा था ll

बिमला बुआ की चिट्ठी सबसे  अजब  अनोखी होती थी
“बाकी सब ठीक हैये लाइन हर लाइन के बाद जरूरी होती थी  ll

बढों को प्रणाम और बच्चो को प्यार l
बाबूजी की दो लाइने अम्मा पढ़वाती कितनी बार ll

वेसे चिट्ठियाँ तो कईयों की पढ़ता था बूढ़े काका की लिख भी देता था  l
कितने सलीके से उनकी बेचेनी  को उसने शब्दो मे  समेटा था ll

दुख भरे तार भी बिना झिझके पहुंचाता था ,l
बस स्याह चहेरे पे कुछ पीलापन उभर आता था ll

इतने बरसों में बन बैठा था आधे गाँव का राजदार  l
बहुत उम्मिदो से  होता था उसका इंतजार ll

हाउस-फुल जाता था उसका पी वी आर (PVR)  l
जहाँ चिट्ठियाँ थीं हीरोइन और विलेन था तार ll

चिट्ठी सबको चाहिए पर तार से इनकार l
संदेशों के खेल मे डँकिया था सुपर-स्टार ll

जी हाँ ! वही डान्किया जो डाँक लाता था l
अपने  कंधे पे  सन्देशे  टाँक  लाता  था ll

असान दिशा-ज्ञान